क्यों मनाते हैं गणगोर का पर्व?

क्यों मनाते हैं गणगोर का पर्व?

गणगौर का त्यौहार मुख्य रूप से राजस्थान में मनाया जाने वाला त्योहार है. गणगौर का अर्थ है गण माने तो शिव एवं गौर यानी गौरी मां. इस दिन भोले नाथ और गौरा की पूजा की जाती है.


मान्यता है की शिव जी ने पार्वती जी को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान दिया था एवं माता पार्वती ने यही वरदान उनको शिव सहित पूजने वाली समस्त महिलाओं को दिया जो इन दिनो में उनका विधि पूर्वरक पूजन करती हैं.

होली के दूसरे दिन से इस त्योहार को शुरू किया जाता है. चैत्र शुक्ल तृतीया को यह त्योहार सम्पन्न होता है. इस सोलह दिनो के त्योहार में महिलाएँ बगीचे से दूर्वा एवं फूल चुन कर लाती हैं, फिर दूर्वा को दूध में डूबा कर उसके छींटे मिट्टी से बनी हुई गणगौर माता को दिए जाते हैं.

इससे एक दिन पहले यानी की चैत्र शुक्ल द्वितियां को महिलाएं पूर्ण शृंगार कर अपने गणगौर को सरोवर, तालाब या फिर कुएं में जल पिलाने के लिए झाँकियों में जाती हैं एवं इसके दूसरे दिन यानी की तृतीया तिथि को इसे संध्या को विसर्जित किया जाता है.

इन पूरे सोलह दिनो में महिलाएँ हर उपलक्ष्य के लिए अलग अलग गीत गाती हैं. इस दिन विवाहिताएं एवं कुंवारी कन्याएं दोनो ही उपवास रख कर शिव एवं गौरी का पूजन करती हैं.

गणगौर का उत्सव घेवर के बिना अधूरा है खीर, चूरमा, पूरी, मठरी से इस ईसर गणगौर को पूजा जाता है आटे और बेसन के घेवर बनाए जाते हैं और गणगौर माता को चढ़ाए जाते हैं गणगौर पूजन का स्थान समूह में किसी एक स्थान अथवा घर में किया जाता है गणगौर की पूजा में गाए जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा होते हैं.

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