क्या ब्रह्मा ने अपनी पुत्री सरस्वती से किया था विवाह?

क्या ब्रह्मा ने अपनी पुत्री सरस्वती से किया था विवाह?

यदि पुराणों की दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी कथावाचक के लिए आसान दिखाई नहीं देता किंतु हांँ इस प्रश्न का आध्यात्मिक तत्वज्ञान से संबंधित पहलु अवश्य है । इस कहानी के पीछे आध्यात्मिक रहस्य निश्चित रूप से, स्पष्ट रूप से छिपा हुआ है । सच तो यह है -इस कहानी में ब्रह्मा एवं सरस्वती नाम के जो पात्र हैं शरीर धारी इंसान है ही नहीं! इस रूप में ये देव शक्तियां शरीर धारी इंसान कभी हुई ही नहीं!

यह आत्मज्ञान के रहस्य को आधार बनाकर पुराणों में रची गई पूर्णतया काल्पनिक कहानी है और पुराणों में ऐसी कई काल्पनिक कहानियां हैं , जिनके वास्तविक तत्व दर्शन को कथावाचक समझा पाने में असमर्थ हैं और ऐसी काल्पनिक कहानियों से सनातन हिंदू समाज सही ज्ञान प्राप्त करने के स्थान पर अज्ञानता के अंधकार की ओर धकेला जा रहा है। धर्म अनुयायियों के मन मस्तिष्क में ये उलझन भरी कहानियां अधिकांशतः चिंतन का विषय बनी रहती हैं और इन्हीं काल्पनिक कहानियों को आधार बनाकर धर्म पर वार करने वाले धर्म विरोधी तत्व धर्म अनुयायियों को अधिकांशतःनीचा दिखाकर मानसिक रूप से भ्रम युक्त स्थिति उत्पन्न करके सनातन परंपरा से विमुख करने का बीज मन मस्तिष्क में डाल देते हैं।

वेद ,उपनिषद, दर्शन ग्रंथ तो जनसामान्य की पहुंच से बिल्कुल दूर हो चुके हैं क्योंकि संपूर्ण उपनिषदों को तो गायत्री परिवार को छोड़कर किसी अन्य प्रकाशन ने प्रकाशित करना ही बंद कर दिया है। गीता प्रेस गोरखपुर में भी संपूर्ण उपनिषद उपलब्ध नहीं हो पाते और यह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए बेहद चिंता का विषय है कि उसके ज्ञान के मूल ग्रंथ विलुप्त होते जा रहे हैं और पाखंड वादी ग्रंथों को जन-जन को परोस कर धर्म को अज्ञानता के अंधकार की ओर धकेला जा रहा है और जब तक उपनिषदों का ज्ञान सनातन धर्म के अनुयायियों ने ग्रहण नहीं किया है तब तक वे वास्तविक अर्थ में सनातन धर्म को कभी भी नहीं समझ सकते!

नहीं समझ सकते कि सनातन धर्म कितना विज्ञान युक्त एवं तार्किक नियमों पर टिका हुआ है ? पुराणों में भी जो कहानियां लिखी गई हैं वे गूढ़ रहस्य से परिपूर्ण हैं किंतु उस गूढ़ रहस्य तक पहुंच पाना हर किसी के लिए संभव नहीं । परमपिता ब्रह्मा जी एवं मांँ सरस्वती की इस कल्पना युक्त कहानी में भी जो कुछ रहस्य छुपा हुआ है वह पूर्ण सत्यता युक्त ही है। अधिकांश पुराणों में परमपिता ब्रह्मा जी एवं मांँ सरस्वती का कथानक आता है और उसमें यही दिखाया गया है कि सरस्वती ब्रह्मा जी की पुत्री थी और ब्रह्मा जी ने सरस्वती से विवाह किया था। यदि आधुनिक समाज के हिसाब से इस घटना को देखा जाए तो यह एक घृणित घटना के रूप में दिखाई देती है।

एक पिता कामातुर होकर अपनी पुत्री से ही संभोग की इच्छा करता है एवं विवाह कर लेता है। इसे किस आधार पर सत्य एवं धर्म युक्त ठहराया जा सकता है। सच तो यह है पुराणों में ऐसी कहानियां जिस किसी ने भी लिखी है। उसने सनातन धर्म का बहुत बड़ा अपमान किया है , घोर अनादर किया है । परिस्थिति चाहे कुछ भी रही हो किंतु किसी भी प्रकार से एक आदर्श समाज के लिए इस कार्य को आदर्श नहीं माना जा सकता। जो वैदिक सत्य सनातन धर्म पूर्णतया तर्क एवं विज्ञान पर टिका हुआ है ।उसमें ऐसी अश्लील एवं मनगढ़ंत कहानियों के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता किंतु जब इस कहानी के वास्तविक तत्व दर्शन को समझने के लिए इस पर गहराई से दृष्टिपात करते हैं तो बहुत कुछ ऐसा है जो खुलकर सामने आता है।

इस रहस्य को यदि हम वास्तविक सत्य दृष्टिकोण में समझें तो सत्य यह निकल कर आता है कि वह पूर्णब्रह्म परमात्मा जो संपूर्ण सृष्टि का सृजन करता है। उसने जब सृष्टि सर्जन करने के बारे में संकल्प जागृत किया तो सर्वप्रथम उसने अपनी बुद्धि रूपी शक्ति अर्थात सरस्वती को जन्म दिया, क्रियाशील किया क्योंकि ब्रह्म अपने वास्तविक स्वरूप में निर्विकल्प है निर्विचार है। वहां पर बुद्धि का एवं चिंतन का अस्तित्व ही नहीं होता और जहां पर बुद्धि का अस्तित्व नहीं है वहां पर विचार भी उत्पन्न नहीं हो सकते और जब तक विचार नहीं हैं जब तक चिंतन नहीं है जब तक कल्पना नहीं है तब तक सृजन का कोई प्रश्न ही नहीं!

तो जब उस परब्रह्म परमात्मा ने सृष्टि सृजन का संकल्प धारण किया तो सर्वप्रथम अपनी बुद्धि रूपी शक्ति को क्रियात्मक रूप दिया ।इसी बुद्धि रूपी शक्ति की क्रियात्मक गति को सरस्वती नाम दिया गया है। इसी शक्ति को अलग-अलग स्थिति में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। विष्णु से संयुक्त करने पर इसे माया,शिव से संयुक्त करने पर इसे शक्ति का नाम दिया जाता है। इसी बुद्धि रूपी शक्ति को इसी माया रूपी शक्ति को इसी मां आदिशक्ति को ब्रह्मा की पुत्री कहा जाता है और जब सृष्टि सृजन का कार्य करने हेतु वह परब्रह्म परमात्मा अपने संकल्प को व्यक्त करता है तो उसे अपनी इसी प्रकृति रूपी ,इसी माया रूपी इसी सरस्वती रूपी पुत्री के साथ स्वयं संयुक्त होकर के अपने क्रिया हीन शून्य स्वरूप को छोड़कर क्रियात्मक रूप को धारण करना पड़ता है। प्रकृति के साथ ब्रह्म की उपस्थिति में ही इस संसार का सृजन होता है।

जब ब्रह्म के साथ बुद्धि की शक्ति रूपी मूल प्रकृति अर्थात सरस्वती की शक्ति जुड़ती है तो उनके संयुक्त स्वरूप से उनकी प्रथम संतान मनु अर्थात मन के रूप में सामने आती है। इसी को ब्रह्मा एवं सरस्वती की प्रथम संतान मनु कहा गया है। यही मन संपूर्ण ब्रह्मांड को क्रियाशील बनाता है और संपूर्ण सृष्टि का सृजन करने में सहायक होता है। यह समष्टि गत मन ही है जो चलाए मान होने पर संपूर्ण ब्रह्मांड को क्रियाशील करके गति प्रदान करता है और शांत स्थिर होने पर स्वयं अपने मूल कारण परब्रह्म का ही रूप धारण कर लेता है।


इस कहानी में मूल रहस्य तो यही है किंतु धर्म के ध्वजवाहक सभी संत महात्माओं ,शंकराचार्यों, कथा वाचकों एवं समस्त विद्वत जनों से कर बद्ध निवेदन है – समस्त पुराणों में ऐसी उलझन भरी जितनी भी कहानियां लिखी गई हैं या तो उनका भावार्थ उस ग्रंथ में पूर्ण स्पष्टीकरण के साथ लिखा जाए या फिर ऐसी कहानियों को हमेशा हमेशा के लिए इन ग्रंथों से हटा दिया जाए। इन सभी ग्रंथों का संशोधन करके पुनः प्रकाशित करवाया जाना चाहिए। जिससे कि धर्म अनुयायी उलझन ग्रस्त होकर भटकें नहीं। शीघ्र ही इस पुण्य कार्य का किया जाना धर्म हित में बहुत जरूरी है।

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