आयुर्वेद का इतिहास – किसने शुरुआत की आयुर्वेद की जानते है इस भाग में

आयुर्वेद का इतिहास – किसने शुरुआत की आयुर्वेद की जानते है इस भाग में

ब्रम्हाजी पिताओं के पिता है इसलिये हम लोग इन्हें पितामह कहा करते हैं। कहा जाता है कि संततिपर पितासे भी बढ़कर पितामहका स्नेह होता हैं। ये कहावत अपने पितामह ब्रह्माजी पर ठीक ठीक चरितार्थ होती है। ये अपना स्नेह हमपर अनवरत बरसाते रहते है यदि कभी हम अपने पथ से विचलित होते है तो इनके हृदय को ठेस पहुँचती है और ये किसी न किसी रूप में हमें सावधान कर देते है।

यदि हम पितामह की जीवनी के पन्ने पलटते है तो देखते है कि हमारे स्नेह में आकर उन्होंने हमारे लिए उन्होंने कठोर से कठोर तप किये हैं। ब्रम्हाजी कमल कि कर्णिका पर बैठे हैं और चिंताओं में निमग्न है, उनकी वह चिंता अपने लिए नहीं थी,अपितु हम लोगो के लिए थी ,वे हमे उत्पन्न करना तथा हमारे खान पान कि व्यवस्था करना चाहते थे, हम कैसे स्वस्थ रहें यही उनकी चिंता थी। फिर वे चारों तरफ देखने लगे कि सृष्टि के लिए कौन-कौन से साधन विधमान हैं? तब उन्हें पाचँ वस्तुए दिखाई दी – कमल ,जल,आकाश,वायु,और अपना शरीर इसके अतिरिक्त उन्हें और कुछ न दिखाई दिया। अब उनके सामने समस्या थी कि सृष्टि किस से और कैसे शुरू करें? तब भगवान ने उन्हें तपस्या करने कि आज्ञा दी, तपस्या जब पूर्णता पर पहुंचने को हुई तो वेद के अर्थ उन्हें याद आ गये, जैसे पुनर्जन्म कि स्मृति होने पर पहले जन्म के माता पिता गांव ,घर ,भाई आदि याद आने लगते हैं ,वैसे ही पितामह ब्रम्हाजी को पुराकल्प के इतिहास के साथ साथ ऐतिहासिक पदार्थों के स्वरूप ,नाम और वस्तु को बनाना और उसका स्वरूप क्या है, उनका नाम क्या है याद आने लगे, इस समस्या को सुलझा कर हमारे खाने-पीने,पहनने और स्वास्थ्य में उपयोग में आने वाले पदार्थ उनको याद आ गए ,किंतु इनको बनाने की क्षमता अभी उनमें नहीं आई थी,क्योंकि किसी पदार्थ बनाने की क्षमता वेद के शब्दों में होती हैं न कि उनके अर्थों में।

हमारी उत्पत्ति के लिए ब्रम्हाजी को फिर से तप करना पड़ा इस प्रकार ब्रम्हाजी हमारे लिए कष्ट झेलते रहें जब तप पूरा हुआ ,तब भगवान द्वारा प्रसारित वेद नित्य स्वर ,नित्य शब्द,और नित्य अर्थों के साथ ब्रम्हाजी को सुनाई पड़े, अब हमारे पितामह ब्रम्हाजी के पास वह शक्ति आ गयी थी कि वेद के शब्दों के द्वारा किसी पदार्थ का निर्माण कर सकें। सृष्टि कि उत्पत्ति के पहले उन्होंने वेद के अर्थों को ,जो कि उनको स्मृत हुए थे,अपने शब्दों में बांध लिया इस ग्रंथ का नाम पुराण पड़ा उसमें एक लाख श्लोक थे इसके बाद जब उदात्त आदि स्वरों के साथ उनके चारों मुखों से चारों वेद निकले तब उन श्रुत शब्दों और स्मृत अर्थों कि सहायता से उन्हों ने आयुर्वेद का ग्रंथ बनाया। उसमें भी उन्हों ने एक लाख ही श्लोक बनाये थे जिन्हे एक हज़ार अध्यायों में समाहित किया गया था, इस तरह सृष्टि की उत्पत्ति के पहले ही ब्रह्या जी ने हमें निरोग रखने के लिए आयुर्वेद को अपने शब्दों में ग्रन्थित कर लिया था इससे यह स्पष्ट हो जा जाता है कि ब्रम्हाजी ही आयुर्वेद के पिता थे।

अपने अगले लेख में हम जानने की कोशिश करेंगे की ब्रम्हा जी ने इन औषधियों का प्रयोग किया या प्रयोग के बिना ही ये औषधियां मानस पुत्रो को प्रदान कर दी, आने वाले लेखो में हम और देवी देवताओ द्वारा आयुर्वेद के प्रचार प्रसार और उत्पत्ति के योगदान को भी देखेंगे ताकि हम समझ सके की आयुर्वेद हमें देवताओ द्वारा दिया हुआ वरदान है ना की कोई मामूली औषधितन्त्र, जिससे रोगो का सम्पूर्ण इलाज़ संभव है, जबकि आज के औषधितन्त्र रोगो को केवल दबा देते है और उनका इलाज़ पूर्णतः संभव नहीं करते।

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