क्या है आत्मसाक्षात्कार?

क्या है आत्मसाक्षात्कार?

प्रायः सबकी दृष्टि आत्मसाक्षात्कार पर रहती है कि यह कैसे हो,इसके लिये क्या करना चाहिए?
सच यह है कि आत्मसाक्षात्कार हरेक मे हर वक्त उपलब्ध है जरूरत केवल नि:संकल्प होने की है।

विचार बराबर चित्त के माध्यम से आवरणरुप मे गुजरते रहते हैं।मै भी एक विचार है,एक आवरण है।अस्तित्व बोध सतत है और यही आत्मसाक्षात्कार है अपने आपमें।इसके लिये कुछ भी नहीं करना है।यह हो ही रहा है।

गलती एक ही होती है इसे रोका जाता है”मै”द्वारा।”मै”एक विचार है जो स्रोत मे से उत्पन्न होता है।यदि अस्तित्व बोध को होने दिया जाय तो”मैं”विलीन हो जाता है या”मैं”के रुप मे मै विलीन हो जाता हूँ,अस्तित्व बोध बना रहता है,वह स्वयं आत्मसाक्षात्कार है।

सारी बाधाएं हमारे अंत:करण रुप मे रहने के कारण आती है।अब होता यह है कि संचित मे से विचार उठते हैं,वृत्तियां उठती हैं।जो प्रिय है उसे भोक्ता भाव से भोगा जाता है,जो अप्रिय है उससे बचा जाता है या उसे रोका जाता है।सारे अनुभव अस्तित्व के आधार पर घटते हैं और वे अस्तित्व से मिले हुए रहते हैं अत:किसी भी अनुभव को रोकना अस्तित्व को रोकना है,किसी भी अनुभव से बचना अस्तित्व से बचना है जो असंभव है।

अस्तित्व से कोई नहीं बच सकता,न अस्तित्व को खुद से बचने की जरूरत है।वह पूर्ण है।सत चित आनंदस्वरूप है। हमारे लिये यह जरुरी है कि हम अस्तित्व बोध को जो स्वत:हो रहा है उसे रोकें नहीं, उसे होने दें।अस्तित्व बोध के साथ सात्विक, राजसी,तामसी विचार,वृत्तियां भी बहेंगी तो उन्हें बहने दें वे स्वत:खाली हो जायेंगी।

अब जो सुखद है हम उसे होने दे सकते हैं बिना रोके,पर जो असुखद मालूम होता है उसे हम रोकते ही हैं।और यही बाधा है। हमे जानना चाहिए कि असुखद को रोकना,अस्तित्व बोध को रोकना है।असुखद को होने देना,अस्तित्व बोध को होने देना है।होने देने का अर्थ है मूल मे आ जाना।ऐसा आदमी आधाररूप हो जाता है।ऐसे लोग कितने हैं?

सब लोग उस अस्तित्व बोध को रोकना चाहते हैं जिसे रोका नहीं जा सकता।अस्तित्व बोध, आत्मसाक्षात्कार है अतः अस्तित्व बोध से बचना,आत्मसाक्षात्कार से बचना है।अजीब बात है।साक्षात्कार से बचना भी है और उसे पाना भी है।हम यह नहीं समझते कि हमारा न होना ही स्वत:सिद्ध आत्मसाक्षात्कार है।वह हर क्षण हो रहा है।

उपाय यही है उसे होने दिया जाय तब हम नहीं हैं मायिक”मैं”रुप मे।अस्तित्व को”मै”की जरूरत नहीं है अलबत्ता”मैं”को जरुर अस्तित्व की(आत्मा की)जरूरत है।उसीके बल पर वह उछलकूद करता है।
क्या यह”मैं”कुछ करता है?मै कुछ नहीं करता,मै के रुप मे हम करते हैं।

हम स्वयं रागद्वेष के वश मे हैं अतः सुखद अनुभव क़ो भोगते हैं और असुखद अनुभव को रोकते हैं और अहंकार के रुप मे बने रहते हैं।हमारे अहंकार रुप का अंत होना चाहिए तब हमारा आत्मरुप स्वत:प्रकट हो जाता है।वह हर वक्त मौजूद है और आधाररूप से हरेक के अनुभव मे आ ही रहा है हर वक्त।

अस्तित्व बोध को न रोकना ही उपाय है।हम अनुभव को असुखद मानकर उसे रोकते हैं।तो हम सुखद का चिंतन करें ताकि अस्तित्व बोध को रोकने की जरूरत न पडे परंतु सजग रहें, सुखद अनुभव को भोगें नहीं।
और दूसरा है क्लिष्ट वृत्तियों के अस्तित्व बोध से मिलने के कारण हम अस्तित्व बोध को रोकना चाहते हैं तो उन वृत्तियों को क्लिष्ट न मानें।

उन्हें कोई नाम न दें,न नाम देकर उनका औचित्य समर्थन(जस्टिफिकेशन)करें, न नाम देकर बुरा मानें; न प्रतिरोध करें, न पलायन तब वे विचार,वृत्तियां हमारे अस्तित्व बोध के आधार पर से गुजरते हुए विलीन हो जाती हैं।सिर्फ आधाररूप अस्तित्व बोध होता रहता है।किसी को इससे कोई समस्या नहीं होती क्योकि यह शांत है,यह आनंदरूप है।

हमे बस यह समझ मे आ जाय कि किसी भी अनुभव को रोकना अस्तित्व बोध को रोकना है,हर अनुभव को होने देना,अस्तित्व बोध को होने देना है।
दूसरे शब्दों मे अस्तित्व बोध को होने देना(जो हो ही रहा है और वही आत्मसाक्षात्कार है)हर अनुभव को होने देना है;और अस्तित्व बोध को रोकना तथाकथित क्लिष्ट अनुभव को रोकना है।

गीता इसीलिए हमारे रागद्वेष के वश मे होने को प्रमुख बाधा बताती है।उसीके कारण निर्विचार,नि:संकल्प रुप मे अस्तित्व बोधरुप बने रहना कठिन हो जाता है।

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जय माँ। जय महाकाल।

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