भारतीय संस्कृति की परिभाषा

भारतीय संस्कृति की परिभाषा

समूह-जीवन जीव को एक नयी चेतना देता है। इसलिए ही आदिकाल से मानव, पशु, पक्षी, आदि समूह मे रहकर जीवन जीते आये हैं। उनमें भी मानवसमूह विशिष्टï है।


मनुष्य समाज में रहता है तथा समाज और संस्कृति एक दूसरे के पूरक हैं। समाज के बारे में आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने परिभाषाएं दी हैं। एक सामाजिक समूह परस्पर संबंध। भूमिकाएं अदा करते हुए, लोगों का स्वयं तथा दूसरों से परस्पर क्रिया की इकाई रूप में माना हुआ, समूह है। इस प्रकार सामाजिक समुदाय कुछ निश्चित लोगों का समुदाय है। इस समूह में ही संस्कृति पलती है

संस्कृति में हमारी भावनाओं, मूल्यों शैलियों और बौद्घिक अभिव्यक्तियों का समावेश होता है। संस्कृति समाज का मूल धन है। वह मूल्यों की ऐसी पूर्ववर्ती सृष्टïी है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति पैदा होता है और विकसित होता है।

संस्कृति मानव को सुव्यस्थित सामाजिक व्यवहार प्रदान करती है। व्यक्ति समाज में रहकर अपनी संस्कृति के अनुसार जीवन व्यतीत कर आनंद प्राप्त कर सकता है।

संस्कृति का दूसरा अर्थ करें तो सम्यक कृति अर्थात परमेश्वर की श्रेष्ठ कृति मानव को सदैव श्रेष्ठता के उन्नत शिखर पर स्थिर रहने का मार्गदर्शन देती हुई, हमारे ऋषिमुनियों के द्वारा सर्जन की हुई एवं तदनुकूल आचारसंहिता का कालक्रम से संस्कृति में समावेश हो गया। भिन्न भिन्न समाजों में भिन्न भिन्न संस्कृति होती है। संस्कृति की अपनी अपनी विशेषताएं रहती हैं। इसी तरह पौर्वात्य एवं पाश्चात्य संस्कृति में भी भिन्नता दिखाई पडती है। जैसे पाश्चात्य देशवासी पौर्वात्य देशवासियों को असभ्य और असंस्कृत मानते हैं। समाज जिस को सत्य मानता है वह उसकी संस्कृति बन जाती है।

संस्कृति में मनुष्य के पूर्वजों के आचरण मार्गदर्शित विचारों, परंपराओं, मान्यताओं, आचार संहिताओं, सुविधाओं और प्रतिमानों का समावेश होता है, जिनसे मनुष्य अपना जीवन सुव्यवस्थित कर सकता है और आनंद प्राप्त कर सकता है। वैदिक संस्कृति वैसी ही संस्कृति है। उससे मनुष्य को जीवन जीने की वैज्ञानिक सूझ मिलती है। वहां मनुष्य को भौतिक और आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने का उपाय दिखाया गया है और वह सुख लोग प्राप्त करते थे। भागदौड के आज के युग में भी मनुष्य वैदिक संस्कृति का मार्गदर्शन कर चिंतामुक्त हो कर सुखी रह सकता है।

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