क्या है मानव जीवन और क्या है साधक जीवन में भेद?

Meditation

क्या है मानव जीवन और क्या है साधक जीवन में भेद?

आज कल देखा जा रहा है सब भेद बकरी बने हुए है जो सामने वाला करता है वही करना स्वम् को भी अच्छा लगता उसका निंर्णय क्या होगा हमारे प्रति सही या गलत इसका विचार तक नही करते है बस लगे हुए है करने किसी भी तरह हो जाये किन्तु कभी सोचा है ऐसा करने से 99 प्रतिशत आपके विपरीत ही कार्य होता है क्योंकि हर मनुष्य के कर्म ऊर्जा विचार सब अलग है तो ये कैसे संभव है इस सोच से स्वम् को हटाना होगा तभी कुछ प्राप्त होना संभव है अन्यथा बस भेड़ बकरी की तरह जीवन व्यापन करते रहोगे ओर जब अनीतिम समय आएगा तब पश्चताप के लिए भी समय नही मिलेगा और आज के समय मे लोग कहते है काम से रिटायर हो जाऊ तो 4 धाम यात्रा करूँगा ये शक्ति पीठ वो शक्ति पीठ ये ज्योतिर्लिंग वो ज्योतिर्लिंग जाऊंगा ।।

अब उनसे मेरा एक सवाल है जो उम्र घर बैठ का अपने ईस्ट गुरु के सिमरन में व्यतीत करनी चाइये क्या उस उम्र में 10 से 25 किलोमीटर की पद यात्रा में आपसे सम्भव है ? नही क्योंकि आपका शरीर आपका साथ देने योग्य नही रहता ।। जब साथ देने योग्य था आपने मिथ्या लोभ लालच झूट काम मे निकाल दिया और अब सोचते हो आप लोग 2 4 साल जो शेष जीवन है उसमें पुण्य कमा ले। ऐसे मनुष्य से एक बात कहूंगा भगवान के दर्शन सिमरन में अपने लोभ को ना लाये यहां तो कुछ शर्म करे इंसान तो बने बाकी आपकी इच्छा

ओर साधक कोन है

साधक के लिए हर एक मनुष्य के जीवन मे छवि अलग है कोई उसे तांत्रिक कहता है कोई उसे उपासक कहता है कोई ढोंगी तो कोई माँ बाबा का बच्चा सबका तो कोई काला जादू करने वाला समझता है सबका नज़रिया अलग है किंतु साधक का पूर्ण अर्थ स्वम् वह मनुष्य भी नही जानता जो स्वम् को साधक साधक करता है ।।

साधक अर्थात मंगल ही मंगल जहां कुछ शेष नही कोई भेद भाव नही ना उसकी पूजा प्रणाली में ना किसी देवी देव में सब एक समान सब एक ही जहां सिर्फ और सिर्फ आत्मबोध वही पूर्ण रूप से साधक है 4 या 5 माला पहने से लाल काले कपड़े पहने से 21 31 41 दिन की साधना करने से कोई साधक नही होता साधक तो वह होता है जो जीवन को भी मृत्यु समझे और मृत्यु को भी जीवन समझे वही पूर्ण साधक है ।।

पर ये अहंकारी मानव दो साधना सिद्धि वाला नही समझ सकता जो सिद्धि से ऊपर की सोच का होगा वही इसका मूल अर्थ समझ पायेगा क्योंकि आज का साधक तो सिर्फ और सिर्फ मंत्रो तंत्रों यंत्रो में सिद्धि खोजता है अपितु सिद्धि कही बहार नही भीतर ही है ओर इसे समझने में उसका अहंकार आगे आ जाता है जब तक सत्य से अवगत नही होगा प्रकर्ति से नही जुड़ेगा तब तक भटकाव में ही साधक जीवन व्यापन करेगा ।।

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