तंत्र साधना का स्थान माँ तारा

तंत्र साधना का स्थान माँ तारा

माँ तारा दस विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं। हिन्दू धर्म में तंत्र साधना का बहुत महत्व है। तंत्र साधना के लिए विन्ध्येशेत्र प्राचीन समय से ही बहुत प्रसिद्ध है, जहाँ साधक वामपंथी साधना की अधिष्ठात्री देवी माँ तारा की साधना करके सिद्दी प्राप्त करते हैं।

तंत्र साधना का स्थल तारापीठ भारत के अनेक क्षेत्रों में स्थापित है। जहाँ वामपंथ की साधना की जाती है। यह पीठ विशेष स्थान ‘मायानगरी’ बंगाल और असंम मोहन नगरी में भी है। आद्यशक्ति के महापीठ विंध्याचल में स्थित तारापीठ का अपना अलग ही महत्व है। विंध्य क्षेत्र स्थित तारापीठ माँ गंगा के पावन तट पर श्मशान के समीप है। श्मशान में जलने वाले शव का धुआं मंदिर के गर्भगृह तक पहुँचने के कारण इस पीठ का विशेष महत्व माना गया है।

इस पीठ में तांत्रिकों को शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसा साधकों की मान्यता है। इस मंदिर के समीप एक प्रेत-शिला है, जहाँ लोग पितृ पक्ष में अपने पित्रो आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। इसी स्थल पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने भी अपने पिता का तर्पण पिंडदान किया था। यह विंध्याचल के शिवपुर के ‘रामगया घाट’ पर स्थित है। यहाँ स्थित माँ तारा आद्यशक्ति माँ विंध्यवासिनी के आदेशों पर जगत कल्याण करती है।

इस देवी को माँ विंध्याचल की प्रबल सहायिका एवं धाम की प्रखर प्रहरी की भी मान्यता प्राप्त है। देवीपुराण के अनुसार, माँ तारा देवी जगदम्बा विंध्यवासिनी की आज्ञा के अनुसार विंध्य के आध्यात्मिक क्षेत्र में सजग प्रहरी की तरह माँ के भक्तों की रक्षा करती रहती है।

साधक साधना की प्राप्ति के लिए प्राय: दो मार्ग को चुनता है- प्रथम मंत्र द्वारा साधना, द्वितीय तंत्र (यंत्र) द्वारा साधना।सतयुग एवं त्रेतायुग में मन्त्र की प्रधानता थी। प्राय: मंत्रों की सिद्धि साधक को हो जाती थी। हालाँकि दुवाप्र से अब तक साधना का सर्वोत्तम स्वरूप तंत्र को माना जाने लगा है। तंत्र साधना के लिए नवरात्री’ में तारापीठ आकर माँ तारा को श्रद्धा से प्रणाम करके तांत्रिक साधना प्रारंभ होता है।

इसके लिए आवश्यक है कि साधक अपनी साधना योग्य गुरु के संरक्षण में ही शुरू करें।

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