सूर्य रेखा

सूर्य रेखा

पृथक, स्वार्थरत जीने वाला ;
कारण को बिसराने वाला
कर्त्ता कहीं नहीं होता
ऊसर में दाने बोता ।

रवि पर्वत पर यश की रेखा स्वतः उभर यदि आई हो,
यह स्वयं के ही सफल कर्म हैं, ज्यों आभा जग आई हो।

सामान्य सूर्य हो, रेखा अकेली अन्य ग्रहों के संग में;
जीवन में संतोष है लाता, सफल करे हर जंग में ।

यशहीन, कर्म से विरत है कोई; भाग्य भरोसे जीवन
क्षेत्र दबा, बिम्ब धूमिल होगा; नहीं सूर्य रेखा के दर्शन।
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ग्रह-बिम्ब क्षेत्र के उच्च स्थल पर रेखा, गुण-सम्पन्न बना देता
झुका बिम्ब हो शनि ओर, तब कर्म क्षीण हो भाग्य को तकता ।

सूर्य ग्रह-बिम्ब खिसक कर बुध-क्षेत्र के पास जो आये,
धन-लोलुपता में कीर्ति कम हो फिर यश का नाश हो जाये ।

जीवन रेखा से निकल अगर सूर्य-क्षेत्र में रेखा जाये ,
कर्मठता का फल देकर जीवन में यश-मान बढ़ाये ।

ह्रदय से निकली सूर्य की रेखा साहस से सफल बनाती;
अधिक एक से यह रेखा हो, कई क्षेत्रों में विजय दिलाती ।
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जैसे चमके सूर्य गगन में, वैसे रेखा सफलता की
हस्तरेख में सूर्य-क्षेत्र पर रेखा मान महत्ता की ।

निकले रेखा किसी क्षेत्र से सूर्य-बिम्ब तक आ जाये,
पार करे सब बाधाओं को मेहनत उसकी रंग लाये ।

अर्द्ध वलय-सी उठती रेखा तीव्र सफलता है लाती,
सीधी सपाट खड़ी रेखा भी यश, मान बहुत बढ़ा देती ।

सूर्य झुका हो, शुक्र तेज हो; मद और काम बढ़ा देता;
उच्च गुरु भी बाधित होगा, मर्यादा भी घटा देता ।
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जय महाकाल !

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