होलिका दहन के पीछे वैज्ञानिक तथ्य।

होलिका दहन के पीछे वैज्ञानिक तथ्य।

हमारे ऋषि-मुनियों ने जो भी त्यौहार बनाये उनके पीछे कई वैज्ञानिक तथ्य छुपे मिले ऐसे ही कपोल कल्पित त्यौहार हमारी संस्कृति में नहीं हैं उसके पीछे कई गूढ़ रहस्य छुपे हैं ।


बता दें कि होली के दिनों में ऋतु परिवर्तन होता है तो शरीर में कफ पिघलकर जठराग्नि में आता है जिसके कारण अनेक बीमारियां होती हैं उससे बचने के लिए होली दहन की तपन से कफ जल्दी पिघल कर नष्ट हो जाता है और दूसरे दिन कूद-फांद कर धुलेंडी खेलने से कफ निकल जाता है जिसके कारण अनेक भयंकर बीमारियों से रक्षा होती है ।

होली के पीछे आध्यात्मिक कारण भी छुपा है, भक्ति करने वाला का हमेशा विजयी होता है चाहे कोई कितना भी अनिष्ट करने की कोशिश करे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।
प्राचीनकाल में होली का दहन गाय के गोबर के कण्डों से किया जाता था जिसमें से ऑक्सीजन निकलता था और धुलेंडी पलाश (केसूड़े) के फूलों के रंग से खेली जाती थी जिससे आने वाले दिनों में गर्मी के कारण होने वाले रोगों से बचाव हो जाता था ।

फाल्गुन शुक्ल की पूर्णिमा की संध्या काल में सुहागिन महिलाओं द्वारा परिवार के सुख समृद्धि की कामना हेतु सामग्री अर्पित कर पूजन किया जाता है। मध्य रात्रि के बाद ब्रह्म मुहूर्त में होइका दहन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ की होलिका दहन के अवसर पर आज भी राजा भर्तृहरि होलिका की अग्नि तापने आते हैं।

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