नवरात्रि के पहले दिन पूजी जाती हैं मां शैलपुत्री, जानिए क्या है उनका महत्व?

नवरात्रि के पहले दिन पूजी जाती हैं मां शैलपुत्री, जानिए क्या है उनका महत्व?

बुद्धवार (२५-०३-२०२०) से चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाला वासंतिक नवरात्र प्रांरभ हो रहा है जो की ०२-०४-२०२० तक चलने वाली रामनवमी तक मनाई जायेगी। इन नौ दिनों में माता के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है, आइये जानते है माता के इन नौ रूपों के बारे में, इनके मन्त्र, इनके रूप और इनसे जुडी कुछ जानी अनजानी बातो के बारे में।

प्रथम स्वरुप माँ शैलपुत्री:
माँ के पहले स्वरुप को शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता का पूर्व नाम सती था और वो राजा दक्ष की पुत्री थी। आदिशक्ति देवी सती का विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार दक्षराज ने विशाल यज्ञ आयोजित किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन शंकरजी को नहीं बुलाया। रोष से भरी सती जब अपने पिता के यज्ञ में गईं तो दक्षराज ने भगवान शंकर के विरुद्ध कई अपशब्द कहे।

देवी सती अपने पति भगवान शंकर का अपमान सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने वहीं यज्ञ की वेदी में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। अगले जन्म में देवी सती शैलराज हिमालय की पुत्री बनीं और शैलपुत्री के नाम से जानी गईं। जगत-कल्याण के लिए इस जन्म में भी उनका विवाह भगवान शंकर से ही हुआ। पार्वती और हेमवती उनके ही अन्य नाम हैं।


माता के दाएं हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल का पुष्प शुशोभित है, त्रिशूल जहा भक्तो को अभयदान देता है वही पापियों का विनाश भी करता है। कमल का पुष्प ज्ञान और शान्ति का प्रतीक है।
माँ का वाहन: इनका वाहन वृषभ है इसलिए माँ को वृषोरूढ़ा और उमा के नाम से भी जाना जाता है।

पूजन फल: माँ शैलपुत्री की साधना का सम्बन्ध चन्द्रमा से है, चन्द्रमा का सम्बन्ध हमारी कुंडली के चौथे भाव से होता है अतः देवी शैलपुत्री की साधना का सम्बन्ध व्यक्ति के सुख सुविधा, निवास स्थान, माता, पैतृक संपत्ति, चल-अचल संपत्ति, वाहन सुख इत्यादि से है।

माँ शैलपुत्री के मन्त्र: माँ के मंत्रो के संदर्भ में अनेको मन्त्र दिए गए है लेकिन हर मन्त्र विभिन्न संदर्भो में दिए गए है, अतः जरूरतों के हिसाब से मन्त्र और उनके जाप का निश्चित विधान है। हम यहाँ आपको माँ के कुछ उपयोगी मन्त्र बता रहे है, ये मन्त्र सौभाग्य और सुख देने के साथ ही शत्रु विनाश में लाभकारी हैं:
बीज मंत्र: ह्रीं शिवायै नमः

ध्यान मंत्र
वन्दे वांच्छित लाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌॥

स्तोत्र पाठ
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्। धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्। सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन। मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥
सुख समृद्धि दायक शत्रु नाशक मन्त्र:
ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः। शत्रुहानि परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः।।
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि।।

माँ शैलपुत्री का कुण्डलिनी से सम्बन्ध: जो साधक कुण्डलिनी जागरण करना चाहते हो वो प्रथम दिन मूलाधार का भेदन करने का प्रयास करें, माँ शैलपुत्री मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी है, इस चक्र के भेदन से मनुष्य को हर प्रकार के भौतिक सुखो की प्राप्ति होती है।

माँ शैलपुत्री का प्रसाद: माँ को भोग में गाय का घी अर्पण करे, ऐसा करने से भक्तों को आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है।

माँ शैलपुत्री का सम्बन्ध हमारी कुण्डलिनी के मूलाधार चक्र से होता है अतः इनकी कृपा के लिए ६,८ या १४ मुखी रुद्राक्ष धारण किया जा सकता है। लाल सूर्यकांत मणि (Red Jasper) या रक्तमणि (Garnet) पहनने से भी माँ की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

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One comment

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