नवरात्रि के दूसरे दिन पूजी जाती हैं माँ ब्रह्मचारिणी, जानिए महत्व।

नवरात्रि के दूसरे दिन पूजी जाती हैं माँ ब्रह्मचारिणी, जानिए महत्व।


माँ के दूसरे स्वरुप को ब्रम्ह्चारिणी के नाम से जाना जाता है, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माँ ब्रम्ह्चारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय के यहाँ हुआ था और उनकी माता का नाम मैना था। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार माँ के जन्म के बाद एक बार नारद मुनि घूमते हुए पर्वतराज हिमालय के यहां पहुंचे, पर्वतराज ने माँ की हस्तरेखाएँ देख कर उनके जेवण का सम्पूर्ण वृतांत बता दिया, इसी दौरान नारद मुनि ने कन्या के वैवाहिक जीवन के अवरोध के बारे में भी बताया, ऐसा जानकार उनकी माँ मैना ने इसका उपाय पूछा तो नारद मुनि ने जप तप का उपाय बता दिया।

अर्थात नारद जी के वचनो के अनुसार कन्या ने व्रत एवं तपस्या प्रारम्भ कर दी। माता ने शुरू में जंगली कंद मुलो के सहारे और बाद में हज़ारो वर्षो तक निराहार व्रत और तपस्या को सम्प्पन्न किया, इसका उध्दरण तुलसी रामायण में भी मिलता है “कछु दिन भोजन वारि बतासा। कीन्ह कछुक दिन कठिन उपवासा।” माँ की कठिन तपस्या से प्रसन्न हो कर ब्रम्हा जी ने माँ को अविनाशी भगवान शिव को पति रूप में पाने का वरदान दिया। ब्रम्ह का मतलब होता है तपस्या और चारिणी अर्थात आचरण करना, मान्यता के अनुसार माँ ने भगवान् शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की, यही वजह है की उनका नाम ब्रम्ह्चारिणी पड़ा।

माता के दाएं हाथ में रुद्राक्ष माला है और बाएं हाथ में कमण्डलु शुशोभित है।

पूजन फल: जैसा की माँ के नाम से ही हमें आभास हो जाता है की माँ की पूजा से हमें सचिदानंदमय ब्रम्ह स्वरुप की प्राप्ति हो सकती है, माँ ब्रम्ह्चारिणी की पूजा अर्चना से जातक के जीवन में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और सयंम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षो में भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता है। माँ की साधना कुंडलिनी जागरण में भी सहायक है, कुंडलिनी जागरण से साधक अपने जीवन में किसी भी प्रकार के आने वाली बाधाओं को आसानी से पार कर सकता है।

माँ ब्रम्ह्चारिणी के मन्त्र:
बीज मन्त्र: ह्रीं श्री अम्बिकायै नमः
ध्यान मंत्र
वन्दे वांच्छित लाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌॥
सांसारिक जीवन में रूप लावण्य, जय, यश को प्राप्त करने के लिए तथा काम व क्रोध के ताप से बचने के लिए अधोलिखित मन्त्र का विधि विधान पूर्वक पूजा करके स्मरण करे-
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि द्विषो जाहि।।
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणता स्मताम।।

स्तोत्र पाठ
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्। ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी। शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥

माँ ब्रम्ह्चारिणी का कुण्डलिनी से सम्बन्ध: जो साधक कुण्डलिनी जागरण करना चाहते हो वो द्वितीय दिन स्वाधिष्ठान/त्रिक चक्र का भेदन करने का प्रयास करें, माँ ब्रम्ह्चारिणी स्वाधिष्ठान चक्र की अधिष्ठात्री देवी है, स्वाधिष्ठान चक्र मानव के विकास के दूसरे स्तर का द्योतक है। इसी में चेतना की शुद्ध, मानव चेतना की ओर उत्क्रांति का प्रारंभ होता है। यह अवचेतन मन का वह स्थल है जहां हमारे अस्तित्व के प्रारंभ में गर्भ से सभी जीवन अनुभव और छायाएं जमा रहती हैं। स्वाधिष्ठान चक्र की जाग्रति स्पष्टता और व्यक्तित्व में विकास लाती है।

माँ ब्रम्ह्चारिणी का प्रसाद: माँ को भोग में मिश्री, चीनी और पंचामृत का भोग लगाया जाता है, इन्ही चीज़ो का दान करने से लम्बी आयु का सुभाग्य प्राप्त होता है।

माँ ब्रम्ह्चारिणी का सम्बन्ध हमारी कुण्डलिनी के स्वाधिष्ठान चक्र से होता है अतः इनकी कृपा के लिए २, १०, १३ या १६ मुखी रुद्राक्ष धारण किया जा सकता है। Carnelian या Fire Agate पहनने से भी माँ की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

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