कुंडलिनी चक्र की असीमित शक्ति से क्या संभव है?

Kundalini

कुंडलिनी चक्र की असीमित शक्ति से क्या संभव है?

सम्पूर्ण ब्रह्मांड से तारतम्य बनाकर हमारी ही आन्तरिक ऊर्जा को को संचालित करने का कार्य करते हैं … सप्त-चक्र।
जब हमारे असंयमित व्यवहार से इन शक्ति केन्द्रों का संतुलन बिगड़ जाता है तो विभिन्न व्याधियों का सामना मनुष्य को करना पड़ता है चलिए आज हम यह जानते हैं की कौन से चक्र के असंतुलित होने का क्या परिणाम द्रष्टिगोचर होता हैं।

  1. मूलाधार चक्र – गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला ‘आधार चक्र’ है। आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता, धन, समृधि, आत्मबल, शारीरिक बल, रोजगार, कर्मशीलता, घाटा, असफलता, रक्त एवं हड्डी के रोग, कमर व पीठ में दर्द, आत्महत्या के विचार, डिप्रेशन, कैंसर अदि होता है।
  2. स्वाधिष्ठान चक्र – इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है। उसकी छ: पंखुरियाँ हैं। इसके बिगड़ने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता, बाँझपन, मंदबुद्धिता, मूत्राशय और गर्भाशय के रोग, आध्यात्मिक सिद्धी में बाधा, आनंद में कमी अदि होता है।
  3. मणिपुर चक्र – नाभि में दस दल वाला मणिपुर चक्र है। इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, नशाखोरी, तनाव, शंकालु प्रवृत्ति, कई तरह की बिमारिया, दवावो का काम न करना, अज्ञात भय, चेहरे का तेज गायब होना, धोखाधड़ी, डिप्रेशन, उग्रता, हिंसा, दुश्मनी, अपयश, अपमान, आलोचना, बदले की भावना, एसिडिटी, ब्लडप्रेशर, शुगर, थाईरायेड, सिर एवं शरीर के दर्द, किडनी, लीवर, केलोस्ट्राल, खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।
  4. अनाहत चक्र – हृदय स्थान में अनाहत चक्र है। यह बारह पंखरियों वाला है। इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता, नफरत, प्रेम में असफलता, प्यार में धोखा, अकेलापन, अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी, मन में उदासी, जीवन में विरानगी, सबकुछ होते हुए भी बेचैनी, छाती में दर्द, साँस लेने में दिक्कत, सुख का अभाव, ह्रदय व फेफड़े के रोग, कोलोस्ट्राल में बढ़ोतरी आदि।
  5. विशुद्धख्य चक्र – कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है। यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष ,अभिव्यक्ति की कमी, गले, नाक, कान, दांत, थाईरायेड, आत्मजागरण में बाधा आती है।
  6. आज्ञाचक्र – भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है। इसके बिगड़ने पर एकाग्रता, जीने की चाह, निर्णय की शक्ति, मानसिक शक्ति, सफलता की राह आदि, इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा।
  7. सहस्रार चक्र – सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है। शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है। वहाँ से जैवीय विधुत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है। इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव, भाग्य का साथ न देना अदि।

इन लक्षणों को समझकर हम ये जान सकते हैं कि हमारा कौन सा चक्र नकारात्क कार्य कर रहा है और उस चक्र को बल प्रदान करके हम जीवन को एक नयी दिशा दे सकते हैं।
कुंडलिनी-चक्रों को संतुलित और वलिष्ट रखने के उपाय या सरल तरीके हम आप सभी को आगे के किसी लेख में बताऐंगे।

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