कैसे करें पूजा एवं साधना

पूजा-उपासना के सम्बन्ध में व्यावहारिक ज्ञान का अभाव है इस संसार में:-
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कोई भी धर्म क्यों न हो, किसी न किसी रूप में भगवान को मनुष्य अवश्य स्मरण करता है। संसार में किसी भी जाति या धर्म का मनुष्य अपनी श्रद्धा के अनुरूप और अपनी शक्ति के अनुसार अपने निवास में किसी न किसी रूप में पूजा स्थल का निर्माण करता है।

यह सत्य है कि ईश्वर सर्वव्यापी है किन्तु दिशाओं का अपना महत्व तो होता ही है। पूजाघर ईशान कोण में होना शुभ है। देवता की कृपा बराबर बनी रहती है। पूजाघर में अन्य कोई मंदिर नहीं होना चाहिए।
पूजा करने वाले का मुख उत्तर या पूर्व दिशा में होना उत्तम है। उत्तर दिशा में कुबेर और लक्ष्मी का वास है। गणेश, कुबेर, दुर्गा का मुख पश्चिम दिशा में तथा हनुमानजी का मुख नैरेत्य कोण में होना कल्याणकारी है।

शयनकक्ष में पूजाघर नहीं होना चाहिए। यदि स्थानाभाव के कारण ऐसा सम्भव न हो तो पूजास्थल में पर्दा लगा देना चाहिए। शयनकक्ष में उत्तर या पूर्व दिशा में पूजास्थल होना चाहिए। उग्र और तामसिक शक्तियों की मूर्ति का मुख पश्चिम या दक्षिण दिशा में होना चाहिए। सोते समय व्यक्ति का सिर यथासम्भव पूर्व दिशा में होना चाहिए ताकि सोते समय व्यक्ति के पांव भगवान की और न हों।

पूजाघर के आसपास या ऊपर-नीचे शौचालय कदापि नहीं होना चाहिए। रसोईघर, पूजाघर और शौचालय एक दूसरे के पास न बनायें। घर में सीढ़ियों के नीचे भी पूजाघर न हो। घर में एक अंगुल से बारह अंगुल तक की मूर्तियों का ही पूजन करना चाहिए। मिट्टी की बनी किसी भी देवता की मूर्ति घर में तीन दिन से अधिक नहीं रखनी चाहिए। इससे परिवार में झगड़ा, मारपीट, रोग, व्याधि, दरिद्रता आती है। घर में चल मूर्ति की स्थापना न करें।

चल हो या अचल, मूर्ति की स्थापना में प्राण प्रतिष्ठा अवश्य होनी चाहिए। मूर्ति के निकट अधिक प्रकाश न हो। बाहरी व्यक्ति को मूर्ति के निकट नहीं जाना चाहिए। इससे मूर्ति की ऊर्जा समाप्त हो जाती है। शक्ति की मूर्तियों की पूजा रात्रि के नौ से ग्यारह बजे के भीतर और देव मूर्तियों की पूजा प्रातः चार से छः के बीच कर लेना चाहिए। किसी भी देवी या देवता की मूर्ति दीवार से थोड़ा हटाकर रखना चाहिए, सटाकर नहीं।

मूर्ति को दरवाजे के ठीक सामने नहीं रखना चाहिए उस पर परछाईं भी नहीं पड़नी चाहिए। गणेश के दाहिने हाथ की ओर और विष्णु के बायीं ओर लक्ष्मी को रखना चाहिए। धन, ऐश्वर्य और शत्रुनाश के लिए चाँदी के गणेश-लक्ष्मी की स्थापना और पूजन करना चाहिए।

पूजा के कमरे में दरवाजे पर दहलीज अवश्य होनी चाहिए। पूजा के समय जलाये जाने वाला दीप यदि भूमि पर रखें तो उसके नीचे चावल अवश्य रखें वरना चोरी होकर रहेगी परिवार में। घी का दीप देवता के दाहिनी ओर और तेल का दीप बायीं ओर जलाना चाहिए। पूजाघर की दीवारों का रंग सफ़ेद, पीला और हल्का नीला होना चाहिए।

हवन कुण्ड और अगरबत्ती का प्रयोग भी आग्नेय कोण में होना चाहिए। देवताओं को ताम्बा धातु अति प्रिय है। इसीलिए उनको प्रसन्न करने के लिए ताँबे के पात्र में देवताओं को भोग लगाना चाहिए। जहांतक सम्भव हो, पूजाघर में ताँबे के ही पात्र होने चाहिए।
भगवान की उपासना करते समय यदि दीपक का स्पर्श हो जाय तो हाथ धो लेना चाहिए अन्यथा दोष लगेगा।

शिवलिंग पर चढ़े हुए फल, फूल, नैवेद्य, भोग का उपयोग नहीं करना चाहिए। गणेशजी को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए। विष्णु मन्दिर की चार बार, देवी मन्दिर की एक बार, शिवजी के मन्दिर की आधी बार, सूर्य मन्दिर की सात बार और गणेश मन्दिर की तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। नवरात्रि में कन्यापूजन के निमित्त एक वर्ष से कम और दस वर्ष से अधिक की कन्या का उपयोग नहीं करना चाहिए। दोष लगता है।
प्रत्येक गृहस्थ को अपने घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए और सायंकाल के समय उस पौधे के नीचे दीपक जलाकर पांच बार परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।

इससे धन, वैभव, ऐश्वर्य, पुत्र, आरोग्य लाभ और परिवार में शान्ति रहती है। घर में मुख्यरूप से एक ही पूजाघर होना चाहिए। यदि छोटे-छोटे कई पूजा घर हैं तो इससे घर के सदस्य दुखी और बेचैन रहते हैं।

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जय महाकाल।।

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