कैसे नवरात्रि का पर्व कोरोना से दूर रहने में कारगर साबित होगा?

कैसे नवरात्रि का पर्व कोरोना से दूर रहने में कारगर साबित होगा?

जैसा की हम सब जानते है की इस वर्ष वासंतिक नवरात्री की शुरुआत चैत्र माह की प्रतिपदा २५ मार्च २०२० से हो रही है। अमूमन हमें साल में पड़ने वाली २ नवरात्रियों के बारे में तो पता है, शरद नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि, इन दोनों नवरात्रियों को मुख्य नवरात्रि के रूप में जाना जाता है, लेकिन हमारी सभ्यता के अनुसार हर वर्ष ४ नवरात्रियाँ आती है जिनमे माघ और आसाढ़ नवरात्रियाँ गुप्त नवरात्रि के रूप में मनाई जाती है।

अगर हम ध्यान देंगे तो हमें ये समझ में आएगा की हर नवरात्री ऋतू परिवर्तन के समय ही आती है और इसलिए हमारे सनातन धर्म ने नवरात्रि के कुछ नियम बनाये है ताकि आम जान मानस स्वयं को सुरक्षित और स्वस्थ्य रख सके। आज के इस भाग दौड़ वाले युग में हम अपने धर्म से दूर और संस्कृति से विमुख होते जा रहे है। धर्म निरपेक्ष या खुद को पढ़े लिखे साबित करने की होड़ में हम स्वयं ही अपने शरीर और पर्यावरण से खिलवाड़ करते जा रहे। जिनके फलस्वरूप कभी चिकन गुनिया तो कभी कोरोना जैसे विषाणुओ के हमले में हम सब अपने आप को असहाय महसूस करते है।

अगर देखा जाए तो हमारे मनीषियों ने साल की चार नवरात्रि में सात्विक और अल्प आहार या यदि संभव हो तो ९ दिन का व्रत, पूजा-पाठ, हवन, जप-तप इत्यादि की सलाह दी थी, आज इस आधुनिकता की दौड़ में हम उन्हें झुठलाते जा रहे है। आइये आज फिर से सनातन की तरफ लौटे और जानने की कोशिश करें की आखिर नवरात्रि की इन मान्यताओं का वैज्ञानिक कारण क्या था, “जी हाँ, बिलकुल सही पढ़ा आपने, नवरात्रि के सारे धार्मिक संस्कारो/ अनुष्ठानो के बहुत ही वैज्ञानिक कारण थे, जिन्हे हमारे पूर्वजो ने बहुत पहले ही समझ लिया था”।

१) व्रत: क्या आप जानते है की नवरात्री के इन ९ दिनों में हमें सात्विक अल्पाहार या व्रत रखने की सलाह दी गई है, उसके पीछे का वैज्ञानिक कारण है की वर्ष की चारो नवरात्रि ऋतुओ के संधिकाल पे आती है और ऋतू परिवर्तन की द्योतक है। ऐसे में हम एक ऋतू को छोड़ कर दूसरी ऋतू की ओर अग्रसर होते है और हमारे खान पान में आमूल चूल परिवर्तन आने वाले रहते है। इन ९ दिनों में यदि हम सात्विक अल्पाहार करे या पूर्ण रूपेण व्रत करे (व्रत में तला भुना और ज्यादा खाना भी हम अपना धर्म समझते है) तो हम अपने शरीर में जमा अतिरिक्त वसा को घटा सकते है और अपने शरीर को विषरहित (Detoxify) कर सकते है।

साथ ही साथ इन ९ दिनों में एक नपा तुला आहार लेने से हमारा शरीर खुद को साफ़ कर के उसे विषरहित कर देता है जिससे की आने वाले समय में हम नए आहार से अपने शरीर को पोषण प्रदान कर सके। नवरात्रि वर्ष में हर ऋतू परिवर्तन के साथ होती है और ऐसे समय में हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कमजोर हो जाती है, ऐसे में हमारे मनीषियों ने ऐसी व्यवस्था दी की आप इस समय मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहते हुए अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में बढ़ोतरी करे और अपने शरीर को विषाणुरहित बनाये।

२) हवन – पूजन : हम सब जानते है की विज्ञान का नियम है की ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है, इसी नियम के अनुसार जब हम मन्त्र जाप करते है तो एक ऊर्जा को जन्म देते है, ये ऊर्जा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर हमें सकारात्मक बनाती है, आकर्षण के नियम के तहत एक सकारात्मक मनुष्य सकरात्मकता को अपनी तरफ आकर्षित करता है और जीवन पथ पर आगे बढ़ता है।


इसी प्रकार हवन में प्रयोग होने वाली सामग्रियां, जैसे आम की लकड़ी, जौ, जटामासी, कपूर, लौंग, इलायची, गुग्गल इत्यादि वातावरण से खतरनाक विषाणुओ को ख़त्म करने में सहायक होते है, शायद इसलिए ही हमारे मनीषियों ने घर में सुबह शाम कपूर इत्यादि को घर में चारो तरफ घुमाने का प्रावधान किया था।


पूजन में हम जिन चीज़ो का प्रयोग करते है वो सब विषाणुओ को मारने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में कारगर है, जैसे पीतल की घंटी, ताम्बे या पीतल के पात्र में रखे जल से आचमन, शंख, धूप (यहाँ ध्यान देने योग्य बात है की अगरबत्ती का प्रयोग कही नहीं कहा गया है), दीप इत्यादि इन के धुएं और आवाज़ में वातावरण में मौजूद विषाणुओ को मारने की अद्भुत और असीमित शक्ति होती है।

इसलिए आइये वापस से सनातन की तरफ चले और इस नवरात्रि अपने मनीषियों की बातो पर मनन करते हुए अपने जीवन को निरोगी और सुखी बनाये।

नवरात्रि की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाओ के साथ आप सबको जय महाकाल समूह की तरफ से हार्दिक अभिनन्दन।

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