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Author: जय महाकाल

क्यों पिया था श्री कृष्ण ने राधा के पैरों का चरणामृत

चरणामृत से सम्बन्धित एक पौराणिक गाथा काफी प्रसिद्ध है जो हमें श्रीकृष्ण एवं राधाजी के अटूट प्रेम की याद दिलाती है। कहते हैं कि एक बार नंदलाल काफी बीमार पड़ गए। कोई दवा या जड़ी-बूटी उन पर बेअसर साबित हो रही थी। तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक ऐसा उपाय करने को कहा जिसे सुन गोपियां दुविधा में पड़ गईं।

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धर्म का हो रहा व्यापार

वक़्त बहुत तेज़ी से बदल रहा है। पहले आध्यात्म का अर्थ था अपना और समाज का कल्याण, प्रभु तक पहुचने का मार्ग, किन्तु कुछ लोगो ने आध्यात्म का मतलब ही बदल दिया,उनकी नज़र में अध्यात्म का अर्थ है भगवान का भय दिखा कर धन कमाना।

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क्यों वर्जित है तुलसी, भगवान गणेश के पूजन में?

गणेश जी को मोदक, गेंदे का फूल, दूर्वा घास, शंख और केला बहुत प्रिय है, लेकिन गणेश जी को तुलसी प्रिय नहीं हैं।  गणेश जी के पूजन में तुलसी वर्जित है।

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गांधी जी के श्लोक की कही-अनकही बातें

भारत में महाभारत का एक श्लोक अधूरा  पढाया जाता है क्यों ? शायद गांधी की वजह से..

“अहिंसा परमो धर्मः” जबकि पूर्ण श्लोक इस तरह से है:-“अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तदैव च l अर्थात – अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है.. किन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उससे भी श्रेष्ठ है..?

गांधीजी ने सिर्फ इस ☝श्लोक को ही नहीं बल्कि
 उसके अलावा  उन्होंने एक प्रसिद्ध भजन को भी बदल दिया… “रघुपति राघव राजा राम” इस प्रसिद्ध-भजन का नाम है. “राम-धुन” . जो कि बेहद लोकप्रिय भजन था.. गाँधी ने इसमें परिवर्तन करते हुए “अल्लाह” शब्द जोड़ दिया.. गाँधीजी द्वारा किया गया परिवर्तन और असली भजन। 

गाँधीजी का भजन 

रघुपति राघव राजाराम,

पतित पावन सीताराम

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,

सब को सन्मति दे भगवान…

जबकि असली राम धुन भजन..
“रघुपति राघव राजाराम पतित पावन सीताराम

सुंदर विग्रह मेघाश्याम

गंगा तुलसी शालीग्राम

भद्रगिरीश्वर सीताराम

भगत-जनप्रिय सीताराम

जानकीरमणा सीताराम

जयजय राघव सीताराम”

बड़े-बड़े पंडित तथा वक्ता भी  इस भजन को गलत गाते हैं, यहां तक कि मंदिरो में भी  उन्हें रोके कौन? ‘श्रीराम को सुमिरन’ करने के इस भजन को जिन्होंने बनाया था उनका नाम था “पंडित लक्ष्मणाचार्य जी”

ये भजन “श्री नमः रामनायनम” नामक हिन्दू-ग्रन्थ से लिया गया है।

मकर संक्रांति विशेष 

मकर राशि में सूर्य का हो रहा प्रवेश
संक्रांति काल लेकर आया पर्व विशेष !
उत्तर में खिचड़ी कहें दक्षिण में है पोंगल

लोहड़ी जो पंजाब में असम में बीहू मंगल !
लकड़ी का एक ढेर हो शीत मिटाए आग

बैर कलुष जल खाक हों पर्व मनायें जाग !
मीठे गुड में तिल मिले नभ में उड़ी पतंग

लोहड़ी की इस आग ने दिल में भरी उमंग !
दाने भुने मकई के भर रेवड़ियाँ थाल

अंतर में उल्लास हो चमकें सबके भाल !

हमारे सभी मित्रों को मकर संक्रांति, उत्तरायणी, पोंगल, बिहू और लोहड़ी पर्वो की हार्दिक शुभकामनायें।

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।।जय महाकाल।।

आयुर्वेद का इतिहास – किसने शुरुआत की आयुर्वेद की जानते है इस भाग में

ब्रम्हाजी पिताओं के पिता है इसलिये हम लोग इन्हें पितामह कहा करते हैं। कहा जाता है कि संततिपर पितासे भी बढ़कर पितामहका स्नेह होता हैं। ये कहावत अपने पितामह ब्रह्माजी पर ठीक ठीक चरितार्थ होती है। ये अपना स्नेह हमपर अनवरत बरसाते रहते है यदि कभी हम अपने पथ से विचलित होते है तो इनके हृदय को ठेस पहुँचती है और ये किसी न किसी रूप में हमें सावधान कर देते है।

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आयुर्वेद का इतिहास

आयुर्वेद, या आयुर्वेदिक दवाइया, भारतीय सभ्यता के इतिहास से जुडी एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है जिसे एक पूरक चिकित्सा के रूप में सदियों से प्रयोग किया जाता रहा है, भूमंडलीकरण या आधुनिकीकरण के दौर में प्रचलित चिकित्सा पद्धतिया एक प्रकार की पूरक चिकित्सा पद्धतिया ही है, पश्चिमी देशो में आयुर्वेद के उपचार और प्रथाओं को सामान्य स्वास्थ्य अनुप्रयोगों में और कुछ मामलों में चिकित्सा उपयोग में एकीकृत किया गया है।

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क्या हैं ध्यान और उसकी विधियाँ?

ध्यान की विधियाँ कौन-कौन सी हैं? ध्यान की अनेकानेक एवं अनंत विधियाँ संसार में प्रचलित हैं. साधकों की सुविधा के लिए विभिन्न शास्त्रों व ग्रंथों से प्रमाण लेकर ध्यान की विधियाँ बताते हैं जिनका अभ्यास करके साधक शीघ्रातिशीघ्र ईश्वर साक्षात्कार को प्राप्त कर सकता है.

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क्या है पंच विकार, कैसे मुक्ति मिलेगी उन विकारो से?

श्री बाबा हनुमानजी के स्वरूप, चरित्र, आचरण की महिमा ऐसी है कि उनका मात्र नाम ही मनोबल और आत्मविश्वास से भर देता है। रुद्र अवतार होने से हनुमान का स्मरण दु:खों का अंत करने वाला भी माना गया है।

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