शास्त्रों में वर्णित है दिव्य अस्त्र एवं शस्त्र।

शास्त्रों में वर्णित है दिव्य अस्त्र एवं शस्त्र।

१.ब्रह्मास्त्र -अचूक और एक विकराल अस्त्र है। यह शत्रु का नाश करके ही छोड़ता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। रामायण काल में यह विभीषण और लक्ष्मण के पास था।

अपने शत्रुओं के विनाश के लिए अर्जुन, कृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, कर्ण, प्रद्युम्न आदि ने ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग समय-समय पर किया था।दो ब्रह्मास्त्रों के आपस में टकराने से प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे समस्त पृथ्वी के समाप्त होने का भय रहता है। यदि ऐसा हो जाये तो फिर से एक नई पृथ्वी तथा जीवधारियों की उत्पत्ति करनी पड़ेगी।

२.नारायणास्त्र पाशुपत के समान विकराल अस्त्र है। इस नारायण-अस्त्र का कोई प्रतिकार ही नहीं है। यह बाण चलाने पर अखिल विश्व में कोई शक्ति इसका मुक़ाबला नहीं कर सकती। इसका केवल एक ही प्रतिकार है और वह यह है कि शत्रु अस्त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक अपने को अर्पित कर दे। कहीं भी हो, यह बाण वहाँ जाकर ही भेद करता है। इस बाण के सामने झुक जाने पर यह अपना प्रभाव नहीं करता।

३.आग्नेय अस्त्र एक विस्फोटक बाण है। यह जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है। ये वे आयुध जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।

४.पर्जन्य अस्त्र एक विस्फोटक बाण है। यह अग्नि के समान जल बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है। ये वे आयुध हैं जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।

५.पन्नग अस्त्र से सर्प पैदा होते हैं। इसके प्रतिकार स्वरूप गरुड़ बाण छोड़ा जाता है।

६.गरुड़ अस्त्र बाण के चलते ही गरुड़ उत्पन्न होते हैं, जो सर्पों को खा जाते हैं।

७.शक्ति अस्त्र लंबाई में गज भर होते हैं, उसका हेंडल बड़ा होता है, उसका मुँह सिंह के समान होता है और उसमें बड़ी तेज़ जीभ और पंजे होते हैं। उसका रंग नीला होता है और उसमें छोटी-छोटी घंटियाँ लगी होती हैं। यह बड़ी भारी होती है और दोनों हाथों से फेंकी जाती है। ये वे शस्त्र हैं, जो यान्त्रिक उपाय से फेंके जाते थे।

८.फरसा अस्त्र एक कुल्हाड़ा है। पर यह युद्ध का आयुध है। इसकी दो शक्लें हैं।

९.गदा एक प्राचीन शस्त्र है। इसकी लंबाई ज़मीन से छाती तक होती है। इसमें एक लंबा दंड होता है ओर उसके एक सिरे पर भारी गोल लट्टू सरीखा शीर्ष होता है। इसका वज़न बीस मन तक होता है। गदायुद्ध की चर्चा प्राचीन साहित्य में बहुत हुई हैं। महाभारत में पात्र भीम, दुर्योधन, जरासंध, बलराम आदि प्रख्यात गदाधारी थे। राम के सेवक हनुमान भी गदाधारी है।

१०.चक्र अस्त्र दूर से फेंका जाता है। श्री कृष्ण ने महाभारत में इसका प्रयोग किया था। प्रमाणों की ज़रूरत नहीं है कि हमारे पूर्वज गोला-बारूद और भारी तोपें, टैंक बनाने में भी कुशल थे। इन अस्त्रों का प्राचीन संस्कृत-ग्रन्थों में उल्लेख है।

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