कैसे पड़ा हरतालिका तीज का नाम?

कैसे पड़ा हरतालिका तीज का नाम?

हरतालिका तीज का व्रत एक सितंबर को रखना है या 2 सितंबर को, इसे लेकर हर कोई असमंजस में हैं. पति परिवार और बच्चों की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाने वाला हरतालिका व्रत 1 सितंबर को है. 1 सितंबर रविवार को सुबह 8 बजकर 26 मिनट से रात्रि 4 बजकर 56 मिनट तक व्रत रखना है. 2 सितंबर को उदया तिथि चतुर्थी होगी और व्रत पूजन रविवार को होगा. आइए आपको आपको व्रत के कुछ खास नियम और रिवाजों के बारे में बताते हैं.

कैसे करें हरतालिका तीज व्रत

इस व्रत पर सौभाग्यवती स्त्रियां नए लाल वस्त्र पहनकर, मेंहदी लगाकर, सोलह श्रृंगार करती हैं और शुभ मुहूर्त में भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा आरम्भ करती हैं. इस पूजा में शिव-पार्वती की मूर्तियों का विधिवत पूजन किया जाता है और फिर हरतालिका तीज की कथा को सुना जाता है. माता पार्वती पर सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है. मान्यता है कि जो सभी पापों और सांसारिक तापों को हरने वाले हरतालिका व्रत को विधि पूर्वक करता है,उसके सौभाग्य की रक्षा स्वयं भगवान शिव करते हैं.

ऐसे करें व्रत का समापन

इस व्रत के व्रती को शयन का निषेध है इसके लिए उसे रात्रि में भजन कीर्तन के साथ रात्रि जागरण करना पड़ता है प्रातः काल स्नान करने के पश्चात् श्रद्धा और भक्ति पूर्वक किसी सुपात्र सुहागिन महिला को श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, खाद्य सामग्री, फल, मिठाई और यथा शक्ति आभूषण का दान करना चाहिए.

कैसे पड़ा हरतालिका तीज नाम

हरतालिका दो शब्दों से बना है, हरित और तालिका. हरित का अर्थ है हरण करना और तालिका अर्थात सखी. यह पर्व भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है,जिस कारण इसे तीज कहते है. इस व्रत को हरितालिका इसलिए कहा जाता है, क्योकि पार्वती की सखी (मित्र) उन्हें पिता के घर से हरण कर जंगल में ले गई थी.

हिन्दू धर्म की परंपराएं कमाल की है। कुछ ऐसी ही परंपरा, रीति एवं रिवाज़ों के आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कारणों से आप को अवगत करवाने की यह छोटी सी कोशिश।

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